साइबर ढगी की दुनिया में स्कैमर्स का नया दांव
स्कैमर्स के अधिकतर शिकार पैसे वाले लोग
कई दिनों या हफ्तों तक चलता है स्कैमर्स का खेल
शिकार व्यक्ति को ही जुर्म से बचाने के नाम पर ढगी
डिजिटल अरेस्ट यानी आभासी हिरासत। साइबर स्कैम की दुनिया की एक ऐसी मायावी मार जो आजकल लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। रोज-बरोज अखबारों में ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जो डिजिटल अरेस्ट के माध्यम से लोगों को ढगने की होती हैं। पुलिस तक शिकायत पहुंचने के पहले ही ढग अपना काम पूरा करके उसकी पहुंच से दूर जा चुके होते हैं।
आभासी हिरासत का शिकार व्यक्ति सम्मोहन के जाल में फंस कर अपना सब कुछ गंवा देता है। ग्रामीण उपभोक्ता पत्रिका ने डिजिटल अरेस्ट यानी आभासी हिरासत के शातिर प्रपंच के विभिन्न आयामों की पड़ताल की और उपभोक्ताओं को उसके स्याह सच से अवगत कराने की कोशिश की है।
बिनोद आशीष
लखनऊ पीजीआई अस्पताल की डा रुचिका टंडन को एक अगस्त 2025 को सुबह एक फोन आता है। फोन पर बताया जाता है कि, हम ट्राई (टेलीकाम रेगुलेटरी अथारिटी) से बोल रहे हैं। पुलिस ने आपका फोन बंद करने के निर्देश दिए हैं क्योंकि मुंबई में आपके नंबर के खिलाफ 22 शिकायतें दर्ज हुई हैं। इस नंबर से लोगों को उत्पीड़न के मैसेज जा रहे हैं। डॉ. टंडन ने ऐसा होने से इनकार किया तो फोन करने वाले ठग ने कहा कि, हो सकता है किसी ने आपको फंसाया हो। आप पुलिस अफसर से बात कर लें। आईपीएस का वेश धरे शख्स ने कहा कि बात सिर्फ आपके फोन नंबर की नहीं है, आपके खाते से भी 7 करोड़ रुपए की मनी लाड्रिंग हुई है। आपको तत्काल अरेस्ट करने के आदेश हुए हैं। आप कहीं आ-जा नहीं सकतीं। हम आपको डिजिटली कस्टडी में लेते हैं। आप इस बात को किसी को बता नहीं सकतीं, बताया तो तीन से पांच साल की जेल और होगी। ठगों ने उनसे एक नया फोन खरीदने को कहा और उसमें व्हाट्सऐप और स्काइप डाउनलोड करवाकर उन्हें कनेक्टेड रखा। इसके बाद बहरूपिए ठगों ने वीडियो कॉल पर सात दिनों तक पूरा केस चलाया। डा टंडन के मुताबिक, वीडियो पर कोर्टरूम था, जज थे, आईपीएस अफसर और सीबीआई वाले भी थे। उन लोगों ने कहा कि वेरिफिकेशन के लिए सभी अकाउंट्स में जो भी पैसा है, उसे सरकारी अकाउंट में ट्रांसफर करना है। अगर मनी लॉन्ड्रिंग नहीं हुई है तो पैसा वापस हो जाएगा। इन ठगों की वीडियो स्क्रीन पर सीबीआई का लोगो था और सभी ने अपने परिचय पत्र भी दिखाए। टंडन के पांच खातों से ठगों ने 2.81 करोड़ रुपए अपने सात विभिन्न खातों में ट्रांसफर करा लिए। वे एक से आठ अगस्त तक डिजिटल अरेस्ट पर रहीं और 10 तारीख को उन्होंने पुलिस को अपने साथ हुई धोखाधड़ी की शिकायत की।
इसी तरह के मामले में, नोएडा के सेक्टर 49 में रहने वाली 73 साल की एक महिला को 13 जून को डिजिटल ठगों ने कूरियर कंपनी का कर्मचारी बनकर डराया कि आपके नाम अवैध सामान भरा एक पैकेट बरामद हुआ है। इस बॉक्स के भीतर आपके आधार, पैन और पासपोर्ट के डिटेल मिले हैं। महिला से पांच दिनों तक बात होती रही। पांचवें दिन उसे 24 घंटे में पुलिस का क्लियरेंस सर्टिफिकेट देने के नाम पर किस्तों में 1.30 करोड़ रुपए ट्रांसफर करा लिए गए। बाद में महिला ने साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई।
विभिन्न राज्यों में ऐसे ढेर सारे मामले दर्ज है और साइबर ठगी देश में इस समय बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है। साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट के माध्यम से लोगों को चूना लगाना शुरू कर दिया है। इसमें आपका मोबाइल फोन ही साइबर ठगों के लिए हथियार का काम करता है। ठगी के इस नए रूप में आपके फोन से आपके ही घर में लूट का तरीका अख्तियार किया जाता है और फिर बदमाशों के झासे में फंसते हुए लोग अपनी जिंदगी भर की लाखों, करोड़ो की कमाई गंवा बैठते हैं। देश के हर शहर में डाक्टर, इंजीनियर, व्यापारी से लेकर पूर्व पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तक इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं और आते जा रहे हैं।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम की सुर्खियां सामने आने के बाद खुद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भी इस स्कैम को लेकर चेतावनी जारी की। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे गंभीरता से लिया है और फोन के रिंग टोन से बार-बार आम लोगों को इससे बचाने के लिए चेतावनी देना शुरू किया है।
साइबर ठगों ने लोगों का आर्थिक दोहन और शोषण करने के लिए एक नया और खतरनाक तरीका अपनाकर इसे डिजिटल अरेस्ट नाम दे दिया है। इस शब्दावली के दो हिस्से हैं डिजिटल अरेस्ट और स्कैम या ठगी। इससे पहले की हम डिजिटेल अरेस्ट को समझें, यहां यह जानना बहुत जरूरी है कि हमारे देश के कानून में इस तरह का कोई शब्द नहीं है। डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक भ्रामक रणनीति है। इसमें अक्सर फोन पर या आनलाइन संचार के माध्यम से किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का झूठा दावा किया जाता हैं। मकसद केवल लोगों में दहशत का माहौल पैदा कर पीड़ित को यह यकीन दिलाना है कि वह आपराधिक गतिविधियों में शामिल है और आखिरकार उनसे बड़ी रकम ऐंठ ली जाती है। ठगी के ये गिरोह इस पूरी प्रक्रिया को बहुत ही सुनियोजित तरीके से अमलीजामा पहनाते है ताकि वारदात होने के बाद पीड़ित व्यक्ति कुछ दिनों तक तनाव में ही सही अपराध की रिपोर्ट दर्ज ना करा सके। एक तरह से साइबर ठग लोगों को ऑनलाइन माध्यम से डराकर उनसे फिरौती मांगते हैं। यही डिजिटल अरेस्ट है। डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा शब्द है जो कानून में नहीं है। लेकिन, इस तरह के बढ़ते अपराधों की वजह से इसे पहचान मिल रही है।
नाम एक तरीके अनेक
डिजिटल अरेस्ट कई तरीकों से किया जाता है। इसमें सबसे अहम बात यही होती है कि जाल में फंसे हुए व्यक्ति को धमकी या लालच देकर घंटों या कई दिनों तक कैमरे के सामने बने रहने के लिए मजबूर किया जाता है जिससे वह घबराहट में अपनी कई निजी जानकारी दे देता है। घबराहट में दी गयी जानकारी का इस्तेमाल कर खाते से पैसा निकालने के साथ पीड़ित का एजेंसियों की जाल से बचने या कहे छुटकारा पाने के लिए मजबूरी में खुद ही अपनी सारी जमा पूँजी ठगों के दिए खाते में जमा करना शामिल होता है।
कैसे होती है ठगी की शुरुआत ?
पूरे स्कैम की शुरुआत एक सरल मैसेज, ईमेल, या व्हाट्सऐप संदेश से होती है। दावा किया जाता है कि पीड़ित व्यक्ति किसी तरह की आपराधिक गतिविधियों में संलग्न है। इसके बाद उसे वीडियो या फोन कॉल करके कुछ खास प्रक्रिया से गुजरने के लिए दबाव डाला जाता है और पुष्टि के लिए कई तरह की जानकरियां भी मांगी जाती हैं। ऐसे कॉल करने वाले खुद को पुलिस, नॉरकोटिक्स, साइबर सेल पुलिस, कस्टम, इनकम टैक्स या सीबीआई अधिकारियों की तरह पेश करते हैं। वे बाकायदा किसी दफ्तर नुमा जगह से संबंधित पुलिस यूनिफॉर्म में फोन करते हैं। जाल में फंसता देख पीड़ित पर गलत आरोप लगा कर उसे तनाव में लाते हुए गिरोह के शातिर सदस्य उस व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई करने की धमकी देकर जोर देता है कि पूछताछ होने के दौरान उसे वीडियो कॉल पर ही रहना होगा और वह किसी और से बातचीत नहीं कर सकता है, जब तक कि उसके दस्तावेज आदि की पुष्टि नहीं होती है।
तनाव में डाल कर बचाने का पैंतरा
डिजिटल अरेस्ट की प्रक्रिया में तरह-तरह के प्रश्न कर पीड़ित को बेचैन कर तनाव में लाया जाता है जिसके बाद तमाम जानकारी हासिल करने के बाद उससे मामला शांत कराने के लिए बातचीत की जाती है। इसमें उससे बड़ी रकम देने को कहा जाता है। ये पैसे ऐसे अकाउंट में डलवाए जाते हैं जिनका अपराधियों की पहचान से कोई लेना देना नहीं होता है और पैसा भी वहां से तुरंत निकाल कर ये लोग गायब हो जाते हैं। गलत तरीके से सिम कार्ड लिया जाता है, गलत तरीके से बैंक खाता खोला जाता है। पैन कार्ड, आधार कार्ड समेत कई अन्य डेटा को गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा किया जाता है। उनके खाते से पैसे ट्रांसफर कराये जाते हैं। कई बार क्रिप्टो या गेमिंग एप के माध्यम से हवाला के जरिए पैसे को बाहर भेजा जाता है।
ठगी के प्रारंभिक तरीके क्या हैं ?
साइबर क्राइम मोटे तौर पर एक संगठित अपराध है। इसके अमूमन चार हिस्से होते हैं। पहला मॉड्यूल फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सिम का इंतजाम करता है। दूसरा मॉड्यूल बैंक अकाउंट खुलवाने का काम करता है। वह गरीबों को लालच देकर उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल कर उससे जुड़े मोबाइल नंबर बदलवा देता है। बदला हुआ नंबर साइबर ठगों का होता है। ऐसे हजारों जीरो बैलेंस वाले अकाउंट खुले हुए हैं जिनमें लाखों रुपए डाले और निकाले जाते हैं। एक बचत खाता खुलवाने पर 15 हजार रुपए और करेंट अकाउंट खुलवाने पर एक लाख रुपए तक खर्च आता है, जिसका इस्तेमाल ठग करते हैं। दस्तावेज और अन्य जानकारी मिल जाने के बाद तीसरा मॉड्यूल शिकार से संपर्क करता है और जांच एजेंसी का अफसर बनकर उगाही में जुटता है। इन तीनों मॉड्यूल के लोगों के ऊपर एक बॉस होता है जो तीनों को रिक्रूट करता है। यह आदमी विदेश में बैठा होता है।
1. फोन आएगा
फोन पर कहा जाएगा कि आपके नाम का कूरियर है जिसमें ड्रग्स हैं या आपके खाते या फोन नंबर से कोई और अवैध काम हो रहा है। बहाने बदल सकते हैं। फिर कथित सीनियर अफसर से बात कराई जाएगी।
2. फिर वीडियो कॉल
ठग आइपीएस अफसर, जज आदि बनकर वीडियो कॉल करेंगे. स्क्रीन पर सीबीआइ, थाने, कोर्ट जैसा डेकोरेशन होगा। आधार, पैन नंबर बताकर केस होने का यकीन दिलाएंगे। वारंट, नोटिस, ऑर्डर आदि दिखाएंगे।
3. डिजिटल अरेस्ट
कहेंगे कि आप डिजिटली अरेस्ट हो गए हैं। किसी से बात नहीं करेंगे, वीडियो कॉल डिस्कनेक्ट नहीं करेंगे। अगर कॉल डिस्कनेक्ट करेंगे तो पुलिस पकड़ेगी, केस चलेगा। छह साल तक की सजा होगी।
4. मनी ट्रांसफर
आपके खातों के वेरिफिकेशन की बात कही जाएगी। ले-देकर मामला खत्म करने के नाम पर ठग आपसे विभिन्न खातों में पैसे ट्रांसफर कराएंगे। क्लियरेंस की बात कहकर फोन काटेंगे और फिर वह फोन बंद हो जाएगा।
कानून से उपर है जालसाजों के फर्जी कानून
यह डिजिटल अरेस्ट इंटरनेट के जरिए ब्लैक मेल से कहीं ज्यादा और खतरनाक है क्योंकि इसमें पैसे के साथ साथ संवेदनशील जानकारियां भी हासिल कर ली जाती हैं। इसमें बैंक अकाउंट नंबर, क्रेडिट कार्ड नंबर, पासवर्ड आदि शामिल हैं। इस मामले में जो सब अहम् बात है, वह यह कि हमारे देश में अभी तक इस तरह से किसी भी प्रकार की पूछताछ, जांच, गिरफ्तारी का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। सरकारी एजेंसी कभी इस तरह कब्जे में लेकर ऑनलाइन पूछताछ नहीं करती है।
क्य़ा ध्यान रखना है ?
लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी सरकारी एजेंसी ऑनलाइन तरीके से पूछताछ नहीं करती है। सरकारी एजेंसी सिर्फ फिजिकल तरीके से पूछताछ करती है। अगर किसी के साथ इस तरीके की घटना होती है तो वह दो तरीके से इसे रिपोर्ट कर सकता है। साइबर फ्रॉड के हेल्पलाइन नंबर या फिर ईमेल के जरिए शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा, आप स्थानीय पुलिस को भी शिकायत दे सकते हैं। अगर आप पुलिस को एक घंटे के भीतर सूचना देते हैं तो ट्रांसफर किए गए पैसे को वापस पाने की संभावना रहती है।
कानून के मुताबिक़ तुरंत क्या करें
साइबर अपराध होने यानी बैंक से पैसा निकलने के बाद अगर एक घंटे के भीतर 1930 पर शिकायत कर दी जाए तो पैसे ब्लॉक होने की गुंजाइश रहती है क्योंकि ठग लेयरिंग (अनेक खातों में पैसा ट्रांसफर का काम) नहीं कर पाता। सही समय पर की गई शिकायत से पहले या दूसरे बैंक के स्तर पर ही पैसा रोका जा सकता है। वैसे, हर किसी के लिए एकमात्र मंत्र यह है कि जिससे कभी मिले नहीं, जिसे देखा नहीं, उसके खाते में पैसा नहीं देना चाहिए। हालांकि, बैंकिंग सिस्टम को भी दुरुस्त करने की जरूरत है। पुलिस और एजेंसियां डिजिटल अरेस्ट से बचने के अनेक दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है, लेकिन लोग पढ़ते ही नहीं। लोगों की डिजिटल साक्षरता बढ़ी पर जागरूकता नहीं और इससे बचने का एकमात्र तरीका जागरूकता ही है।
आपको क्या करना है ?
- जिस वॉलेट में, खाते में पैसा दिया है उसकी जानकारी नोट कर लें, स्क्रीनशॉट ले लें, ठग का फोन नंबर नोट कर लें। स्क्रीन रिकॉर्डिंग करें, कोई लिंक क्लिक न करें
- https://cybercrime.gov.in/- पर जाकर तत्काल ऑनलाइन शिकायत करें।
- 1930 डायल कर सूचना दें, यहां पर ठगी गई रकम बैंक अकाउंट में फ्रीज कराई जा सकती है।
- 1930 न लगे तो स्थानीय पुलिस को 112 पर फोन करें।
पूरे स्कैम की शुरुआत एक सरल मैसेज, ईमेल, या व्हाट्सऐप संदेश से होती है। दावा किया जाता है कि पीड़ित व्यक्ति किसी तरह की आपराधिक गतिविधियों में संलग्न है। इसके बाद उसे वीडियो या फोन कॉल करके कुछ खास प्रक्रिया से गुजरने के लिए दबाव डाला जाता है और पुष्टि के लिए कई तरह की जानकरियां भी मांगी जाती हैं। ऐसे कॉल करने वाले खुद को पुलिस, नॉरकोटिक्स, साइबर सेल पुलिस, कस्टम, इनकम टैक्स या सीबीआई अधिकारियों की तरह पेश करते हैं।
डिजिटल अरेस्ट की प्रक्रिया में तरह-तरह के प्रश्न कर पीड़ित को बेचैन कर तनाव में लाया जाता है जिसके बाद तमाम जानकारी हासिल करने के बाद उससे मामला शांत कराने के लिए बातचीत की जाती है। इसमें उससे बड़ी रकम देने को कहा जाता है। ये पैसे ऐसे अकाउंट में डलवाए जाते हैं जिनका अपराधियों की पहचान से कोई लेना देना नहीं होता है और पैसा भी वहां से तुरंत निकाल कर ये लोग गायब हो जाते हैं।
