गांव में पानी पहुंचा… फीता काटने का मौका नहीं दिया तो नाराज हो गए नेताजी

गांव में पानी पहुंचा… फीता काटने का मौका नहीं दिया तो नाराज हो गए नेताजी

भारत में पानी और सफाई जैसे विषयों पर स्थिति बहुत खराब  

 

फोटो ऑपर्चुनिटी नहीं, जमीन पर काम करने का विषय 

 

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भारत में स्वच्छ भारत मिशन और हर घर जल योजना की चर्चा बड़ेजोर शोरों से की गई। समय- समय पर तमाम अभियान इस बाबत शुरू किए गए। नेताओं की भव्य तस्वीरें रवायती तौर पर समाने आईं लेकिन हकीकत में तस्वीर क्या है, यह जांचने और समझने का विषय है। 

अभी हाल ही उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की जिलाधिकारी और तेज तर्रार आईएएस अफसर दिव्या मित्तल को तत्काल इसलिए पद से स्थानांतरित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने हर घर जल योजना के तहत एक गांव में नल से पानी पहुंचाय़ा लेकिन उसका उद्घाटन किसी नेता से करवाने के बजाए उसे सीधे जनता को उपलब्ध करवा दिया। ये बात नेताजी को नागवार गुजरी और फौरन उन्हें पद से हटा दिया गया। 

बात यहीं तक होती तो भी कोई बात थी। स्थानीय विधायक और सांसद के पिछलग्गुओं ने तोड़फोड़ की और गांव तक जो पानी पहुंचा था वह भी बंद हो गया। 

इससे जाहिर क्या होता है कि ये योजना जनता के लाभ के लिए बाद में है पहले नेताजी की तस्वीर के लिए है। इसी से समझा जा सकता है कि साफ पानी हो या सफाई भारत जैसे देश में स्थिति इतनी विकट क्यों है। लेकिन बात यहां बड़े फलक की है। हम आपको दुनिया में संदर्भ में इन विषयों पर सुविधाओं की उपलब्धता की तस्वीर से रूबरू कराएंगे।       

कुछ तथ्य 

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ ने विश्व जल सप्ताह 2025 के मौके पर अपनी नई रिपोर्ट “प्रोग्रेस ऑन हाउसहोल्ड ड्रिंकिंग वाटर एंड सैनिटेशन 2000-2024: स्पेशल फोकस ऑन इनइक्वैलिटीज” जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार :

 

  • दुनिया में हर चौथा व्यक्ति अब भी साफ पानी से वंचित है।
  • 10.6 करोड़ लोग सीधे नदियों, तालाबों या झीलों से पानी पीने को मजबूर हैं।
  • 1.7 अरब लोगों के पास बुनियादी स्वच्छता सेवाएं भी नहीं हैं। 
  • 61.1 करोड़ लोगों के पास तो हाथ धोने या स्वच्छता के लिए कोई भी सुविधा नहीं है।
  • पूरी दुनिया में अरबों लोग आज भी स्वच्छ व सुरक्षित पीने के पानी और बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं से वंचित हैं।  
  • पिछले दस सालों में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन स्थिति अब भी विकट है। 
  • सबसे कमजोर समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

 

सबसे ज्यादा प्रभावित समुदाय

यह समस्या हर जगह समान नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि कम विकसित देशों में रहने वाले लोग बाकी देशों की तुलना में दो गुना ज्यादा पानी और शौचालय सेवाओं से वंचित हैं। नाजुक हालात वाले क्षेत्रों में सुरक्षित पानी की पहुंच बाकी देशों से 38 प्रतिशत कम है। यानी गरीबी, असुरक्षा और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा कठिनाई झेलते हैं।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का अंतर

रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। 2015 से 2024 के बीच ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित पानी की पहुंच 50 फीसदी से बढ़कर 60 फीसदी हो गई। इसी अवधि में बुनियादी हाथ धोने की सुविधा 52 फीसदी से बढ़कर 71 फीसदी हो गई। लेकिन शहरी क्षेत्रों में स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। यानी गांवों में थोड़ी प्रगति हुई है, पर शहरों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।

महिलाओं और लड़कियों पर असर

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिलाएं और किशोरियां इस संकट का बोझ ज्यादा उठाती हैं। 70 देशों के आंकड़े दिखाते हैं कि अधिकांश महिलाओं और लड़कियों को पीरियड्स के समय बहुत सी दिक्कतों का सामना करना है। ज्यादातर देशों में महिलाएं और लड़कियां ही पानी लाने की जिम्मेदारी निभाती हैं। अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में वे रोजाना 30 मिनट से ज्यादा समय पानी लाने में खर्च करती हैं। इसका सीधा असर उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ता है।

सतत विकास लक्ष्य और चुनौती

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2030 तक यह लक्ष्य रखा है कि हर व्यक्ति को सुरक्षित पानी, शौचालय और स्वच्छता सेवाएं उपलब्ध हों। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि मौजूदा गति से यह लक्ष्य पाना मुश्किल होता जा रहा है।

रिपोर्ट में पहली बार भारत के लिए कुल अनुमान उपलब्ध है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर नए एकत्रित आंकड़े पिछली रिपोर्ट की तुलना में आंकड़ों की उपलब्धता में बहुत अधिक वृद्धि हुई है।

 

भारत के स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के मुताबिक, फरवरी 2025 तक, स्वच्छता सुविधाओं वाले 17 फीसदी घर मल-अपशिष्ट उपचार संयंत्रों से जुड़े थे।

खासतौर पर खुले में शौच को खत्म करना और बुनियादी पानी व स्वच्छता सेवाएं हर व्यक्ति तक पहुंचाना अब भी संभव है, लेकिन इसके लिए सरकारों और सामाजिक संगठनों को बहुत तेजी से काम करना होगा। वहीं सभी लोगों तक सुरक्षित और प्रबंधित सेवाएं पहुंचाना अब असंभव के करीब दिखने लगा है।

यह रिपोर्ट  के अनुसार, पानी और स्वच्छता सेवाएं केवल विकास का हिस्सा नहीं बल्कि जीवन और गरिमा का मूलभूत अधिकार हैं। अरबों लोग अब भी इन सुविधाओं से वंचित हैं और अगर तुरंत और बड़े पैमाने पर कदम नहीं उठाए गए, तो 2030 तक हर व्यक्ति तक सुरक्षित पानी और शौचालय पहुंचाने का सपना अधूरा रह जाएगा। 

निराशा में आशा की किरण 

नागालैंड विश्वविद्यालय़ द्वारा पानी के रिचार्ज और रिकवरी विषय पर एक बहु-देशीय शोध में इस समस्या का अध्ययन किया गया और उसे विशेषकर भारत के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया।

सिर्फ तकनीक नहीं किसान का साथ भी चाहिए   

शोध के निष्कर्षों में ये बात सामने आई कि जिन गांवो में किसानों ने इन विषयों पर अफने दायित्वों को समझते हुए काम किए वहां स्थिति बेहतर हुई। अध्ययन के मुताबिक, भारत के गांवों में अगर पानी की समस्या का टिकाऊ हल चाहिए, तो सिर्फ तकनीक से नहीं, बल्कि किसानों की भागीदारी से ही बदलाव मुमकिन है। नागालैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए इस बहु-देशीय शोध ने यह साफ कर दिया है कि ‘एक्विफर रीचार्ज एंड रिकवरी’ यानी एएसआर जैसी तकनीक तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक इसमें स्थानीय लोग खासकर किसान खुद भाग न लें। शोध टीम का नेतृत्व नागालैंड विश्वविद्यालय के प्रो. प्रभाकर शर्मा ने किया।

एएसआर तकनीक का उद्देश्य वर्षा या सतही जल को विशेष संरचनाओं के जरिए जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल स्तर को फिर से भरना है। दक्षिण बिहार के नालंदा जिले के मेयर और नेकपुर गांवों में इस तकनीक को पायलट तौर पर आजमाया गया। मेयर गांव के किसानों ने सामूहिक जिम्मेदारी निभाते हुए इन ‘रीचार्ज पिट्स’ की नियमित सफाई और देखरेख की, जिससे उन्हें बेहतर सिंचाई, अतिरिक्त फसलों की बुवाई और भरोसेमंद पैदावार का लाभ मिला। वहीं, नेकपुर में किसानों की उदासीनता और संदेह के कारण संरचनाएं बेकार पड़ी रहीं। यह फर्क साफ दिखाता है कि तकनीक तभी टिकती है जब लोग उसे अपनाएं।

सरकार से नीतिगत समर्थन की अपेक्षा 

यह शोध बताता है कि एएसआर का भविष्य केवल इंजीनियरिंग मॉडल पर नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और नीतिगत समर्थन पर टिका है। अध्ययन के अनुसार एक रीचार्ज पिट की लागत करीब 33,000 से 35,000 रुपए आती है, जो परंपरागत बोरवेल से सस्ता है। फिर भी अधिकांश किसान खुद इस पर निवेश करने से हिचकते हैं और सरकारी या संस्थागत सहयोग की अपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने नीति-निर्माताओं से आग्रह किया है कि वे शुरुआती चरण में मध्यम और बड़े किसानों को लक्षित कर सामूहिक भागीदारी को बढ़ावा दें।

शोध सिर्फ गांव के अनुभवों तक सीमित नहीं था। इसमें पानी की गुणवत्ता, मिट्टी की अवशोषण क्षमता, स्थल की ऊंचाई, वर्षा के आंकड़े और सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं के आधार पर साइट चयन किया गया। भूगर्भीय परीक्षणों और जल रसायन विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि दक्षिण बिहार की जमीनें एएसआर के लिए अनुकूल हैं। खासकर वे इलाके जहां चट्टानी या गहरे नद-तटीय एक्विफर मौजूद हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया कि एएसआर तकनीक के जरिए न सिर्फ सिंचाई का भरोसा बढ़ता है, बल्कि पानी की उपलब्धता लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे कृषि में विविधता और आमदनी दोनों बढ़ते हैं।

इस शोध ने भुंगूरू जैसी देसी तकनीकों का भी संदर्भ दिया है, जिनका इस्तेमाल स्थानीय जरूरतों के मुताबिक किया जा सकता है। भुंगरू एक कम लागत वाली भूमिगत संरचना है, जो बरसाती पानी को भूमि की निचली जलधाराओं में पहुंचाती है। यह खासकर उन जगहों पर उपयोगी है जहां एक ही क्षेत्र में साल में कभी बाढ़ आती है और कभी सूखा पड़ता है। यानी पानी कभी जरूरत से ज्यादा और कभी बिल्कुल नहीं।

मॉडल को व्यापक आधार देने की जरूरत

शोध में एक व्यापक क्रियान्वयन मैनुअल तैयार करने की सिफारिश की गई है, जिससे दूसरे राज्यों और जलसंकट वाले क्षेत्रों में भी एएसआर को लागू किया जा सके। शोध में कहा गया है कि भारत जैसे देश, जो दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल इस्तेमाल करते है, वहां केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। जब तक किसान नीतियों के केंद्र में नहीं होंगे, तब तक किसी भी तकनीक की उम्र सीमित रहेगी। जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और जल स्रोतों के सूखने की चुनौती से जूझते ग्रामीण भारत के लिए एएसआर एक मजबूत विकल्प बन सकता है, बशर्ते इसे सामूहिक भागीदारी और सामाजिक न्याय के मॉडल के रूप में अपनाया जाए।