डिजिटल मार्केटिंग के नाम पर फैलते गोरखधंधे का जंजाल

डिजिटल मार्केटिंग के नाम पर फैलते गोरखधंधे का जंजाल

लालच के चलते ठगा जा रहा है उपभोक्ता

प्रभावी कानून का अभाव भी है एक वजह

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पिछले दिनों दिल्ली – एनसीआर के इलाके में डिजिटल मार्केटिंग के नाम पर गोरखधंधा करने वाली कई कंपनियों का पर्दाफाश हुआ। भोलेभाले उपभोक्ता लालच के चक्कर में आकर अपना काफी कुछ गंवा बैठे। वैसे भी साइबर अपराध के लिए देश में अब तक कोई प्रभावी कानून नहीं है और इसका फायदा उठा कर उपभोक्ताओं को खूब ठगा जा रहा है। ग्रामीण उपभोक्ता पत्रिका ने इस गोरखधंधे की तह तक पहुंचने की कोशिश की और उपभोक्ताओं को यह समझाने का प्रयास किया है कि कैसे उन्हें धोखा दिया जा रहा है।   

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चिटफंड जैसा मिलता जुलता धंधा

उपभोक्ता लालच के चक्कर में होता है शिकार

शुरू में कुछ पैसे भी मिलते हैं उपभोक्ता को 

लाइक से लेकर ट्वीट कराने तक का है खेल

पैसे से लिखाया जाता है पॉजीटिव रिव्यू 

पकड़े जाने के बाद भी बंद नहीं होता धंधा

ठोस कानून का न होना सबसे बड़ी कमी

सरकार को बनानी होगी ठोस नीति

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हाल फिलहाल देश में डिजिटल मार्केटिंग के नाम पर उपभोक्ताओं के साथ खेल खेलने की काफी बडे- बड़े रैकेटों के धंधे का पर्दाफाश हुआ है। पिछले दिनों नोएडा में एक बहुत बड़ी कंपनी डिजिटल माध्यम से किस तरह लोगों का पैसा हड़प रही थी यह सबके सामने आयाहर इंसान और ब्रैंड चाहता है कि उसे दुनिया भर के लोग इतना पसंद करें कि वह कामयाबी के आसमान पर पहुंच जाए। लेकिन क्या पसंद होने का कोई शॉर्टकट है। हम कह सकते हैं कि डिजिटल दुनिया की मौजूदा स्थिति में तो है। इसे डिजिटल मीडिया मार्केटिंग कहते हैं। इसी दुनिया से एक रास्ता जुर्म की उन गलियों में जाता है जहां क्लिक करके पैसे कमाने का पोंजी मॉडल काम करना शुरू करता है और उपभोक्ता उसके शिकार बनते हैं। 

 

सबसे पहले यह समझने की कोशिश करते हैं कि डिजिटल मीडिया मार्केटिंग कहते किसे हैं ?

 

डिजिटल मार्केटिंग है क्या ?

 

मोबाइल और कंप्यूटर पर इंटरनेट के जरिए अपने ब्रैंड को बेहतर से बेहतर साबित करने की दौड़ ही असल में डिजिटल मार्केटिंग है। जब इंटरनेट नहीं था तब ये सारी कवायद सर्वेक्षणों और विज्ञापनों के जरिए की जाती थी। इंटरनेट के आने के साथ ही साइबर दुनिया पर डिजिटल मार्केटिंग का दौर शुरू हो गया। सोशल मीडिया के आने से सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि जहां पहले वेबसाइट पर लोगों के आने का इंतजार करना होता था वहां अब उन तक सीधे पहुंचा जा सकता था।

 

फेसबुक और ट्विटर या एक्स पर जैसे-जैसे लोग बढ़ते गए, डिजिटल मार्केटिंग अपना रंग-रूप और पैंतरे बदल कर लोगों तक पहुंचने की कोशिश करने लगी। फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर ट्रेंड करते ही ब्रैंड की साख तो बढ़ती ही है साथ ही इस साख के आंकड़े बैलेंस शीट पर भी कमाई के तौर पर नजर आने लगते हैं। 


सर्च में भी है सेटिंग

 

इंटरनेट पर सब कुछ मिलता है, बस इसे ढूंढने के लिए गूगल पर जाना होगा। गूगल पर एक ही चीज के लिए आपको ढेरों विकल्प दिखाई पड़ेंगे। इनमें से मनचाहा विकल्प चुना जा सकता है। हर ब्रैंड चाहता है कि सर्च में उसका ब्रैंड सबसे ऊपर आए। कोई चीज कैसे सर्च में ऊपर आएगी इसके लिए गूगल ने अपने सॉफ्टवेयर में खास सेटिंग की हुई हैं। इनके हिसाब से वेबसाइट बनाने पर गूगल इसे खुद-ब-खुद ऊपर दिखाता है। यानी मतलब साफ है जितना गूगल की मानोगे सर्च में उतना ही ऊपर दिखाई दोगे।

 

लाइक चाहिए, तो लाइक भी मिलेगा

 

अगर आपके साथ फेसबुक पेज पर लाइक न होने की समस्या है तो उसका इलाज भी है। बाकयदा इसके लिए वेबसाइट पर रेटलिस्ट होती है। महीने से लेकर साल तक का हिसाब होता है। लाख लाइक चाहिए तो भी है, हजार चाहिए तो भी सेवा उपलब्ध है। वेबसाइट पर किसी खास लोकेशन से लाइक लेने के ऑप्शन के बारे में भी बताया जाता है। 

 

अगर आपको हर हफ्ते के हिसाब से लाइक चाहिए जिससे किसी को शक न हो कि आप लाइक खरीद रहे हैं तो उसका भी इंतजाम है। एक दूसरी एजेंसी ने हमें बताया कि वह हर हफ्ते के हिसाब से कुछ हजार लाइक्स हमारे पेज पर देगी जिससे लाइक्स को लेकर किसी तरह का शक नहीं होगा। इसके लिए महीने में 25 से 30 हजार का खर्च आएगा।

एक्स या ट्विटर की ट्रेंडिंग

 

ट्विटर पर फ़ॉलोवर्स बढ़ाना है तो उसका भी तोड़ है। 10 हजार रुपए में 25 हजार फॉलोअर आराम से मिल जाएंगे। किसी खास हैशटैग पर ट्रेंड करवाने के भी तरीके हैं। उसके लिए  पेड ट्रेंडिंग सर्विस होती है। इस काम के लिए बड़े ही सुनियोजित तरीके से काम करने का एक सिस्टम होता है। किसी भी टॉपिक को ट्रेंड करवाने के लिए बाकायदा देश भर में टीमें होती हैं और तय किए गए वक्त पर लोग ट्रेंड करवाने वाले हैशटैग पर ट्वीट करना शुरू कर देते हैं। अमूमन कंपनी 1 घंटे तक टॉप 3 जगहों पर ट्रेंड करवाने के लिए चार्ज करती हैं।
लोकल ट्रेंडिंग में जहां रेट की शुरुआत 25 हजार रुपए से होती है वहीं राष्ट्रीय में ये रेट 1 लाख रुपए तक जा सकता है। 

 

गूगल पर ये लाते हैं आगे

गूगल पर सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन या SEO के नाम पर देश भर में एक बड़ी इंडस्ट्री काम कर रही हैं। आपको सर्च में ऊपर ले जाने के अलग-अलग और गारंटीशुदा प्लान हैं। इसके लिए हर महीने 20 हजार रुपए से 45 हजार रुपए तक देने होंगे। इसके लिए उन्हें वेबसाइट का पूरा कंट्रोल देना होगा। 

 

रिव्यू के चैंपियन

अगर आपको अपनी वेबसाइट पर पॉजीटिव रिव्यू लिखाना है तो उसके लिए भी बंदोबस्त है। इसके लिए सोशल मीडिया पर इनवेस्ट करने की सलाह दी जाती है लेकिन आपकी वेबसाइट पर भी लिखवाया जा सकता है। इसके लिए बाकायदा पैसा लिया जाता है। प्रति रिव्यू 5000 रुपए तक वसूला जाता है

 

लाइकके नाम पर ठगी

 

डिजिटल मीडिया मार्केटिंग की इस टेढ़ी लकीर को तोड़-मरोड़ कर कुछ लोगों ने इसे डिजिटल इंडियाकैंपेन के नाम पर लोगों को ठगने का काम भी शुरू कर दिया है। इस लकीर में लोगों को लपेटने का चारा यह डाला गया कि बिना पैसे खर्च किए बस एक क्लिक के जरिए घर बैठे पैसे कमाएं। गूगल सर्च में ऊपर आना पूरी तरह से उसके स्मार्ट सॉफ्टवेयर की तकनीक पर निर्भर है। गूगल मापदंडो पर डिजाइन किए जाने पर ही वेबसाइट सर्च में अपनी जगह बनाती है।

 

अब हम आपको यह समझाने का प्रयास करते हैं कि इस धंधे में कमाई के फंडे क्या हैं ?

 

कैसे कमाते हैं पैसा ?

 

  • सबसे पहले कंपनी की वेबसाइट पर जाना होगा या ऐप डाउनलोड करना होगा।
  • इस पर लॉगइन करने के लिए एक रेफरेंस कोड की जरूरत होगी। यह कोड या तो कंपनी की वेबसाइट पर फोन करने से मिलेगा या किसी सदस्य से लिया जा सकेगा।
  • जैसे ही रेफरेंस कोड डालेंगे, आप ऐप के जरिए काम करने के लिए तैयार हैं।
  • इसके बाद कुछ पेजों को लाइक करने का टास्क दिया जाएगा। कंपनी इसे दुनिया भर में मौजूद अपने कस्टमरों के पेज बताती है लेकिन असल में ये लोकल सर्वर पर ही मौजूद पेज होते हैं। इन पर लाइक करवाने के बाद पहली बार में कुछ रकम आपके खाते में डाल भी जाती है।
  • ये पैसे आपको विदड्रॉल करने के लिए, दो या कंपनी पॉलिसी के हिसाब से कुछ और मेंबर बनाने होते हैं
  • इस दौरान आपसे और बाकी मेंबर्स से आगे की कमाई के लिए इन्वेस्ट करने के लिए कहा जाता है।
  • इस दौरान यह ताकीद की जाती है कि जिन लोगों को अपने जरिए भेजेंगे, उन्हें अपना रेफरेंस नंबर दें। इससे आपकी कमाई और बढ़ेगी।

 


क्या कहता है कानून ?

साइबर मामलों में विशेषज्ञों का कहना है कि लाइक और फॉलोअर खरीदना कानूनन आईटी एक्ट की धारा 66 डी और आईपीसी की धारा 415 और 420 के तहत धोखाधड़ी, कालाबाजारी और पहचान छुपाना के दायरे में आता है।

इस तरह के मामले में कार्रवाई इसलिए नहीं होती क्योंकि न तो लाइक खरीदने वाले और न बेचने वाला किसी तरह की शिकायत दर्ज करते हैं। चूंकि लाइक और फॉलोअर बेचने का कोई लीगल बिजनस है ही नहीं ऐसे में पूरी कमाई भी ब्लैक में होती है। जब लाइक और फॉलोअर बेचने का चार्ज लिया जाता है तो उसे भी बिल में लिखा नहीं जाता। सिर्फ सोशल मीडिया मार्केटिंग का जिक्र करके बिल बना दिया जाता है। सरकार और फेसबुक, गूगल और ट्विटर जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों की कमजोर इच्छाशक्ति और ढुलमुल नीतियों के कारण इस पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया है।

 

ऐसे बनते हैं आप बेवकूफ

इस पूरे मॉडल को इस तरह से तैयार किया गया है कि इसमें फंसने वाले को किसी भी तरह का शक न हो। पहले इसे डिजिटल मीडिया मार्केटिंग से जोड़ कर लोगों की तकनीक की सीमित समझ के सहारे छला जाता है। इन कंपनियों ने डायरेक्ट सेल, चेन के जरिए बेचने और पोंजी सिस्टम का एक ऐसा कॉकटेल तैयार किया है जिससे कोई बच न सके। ठगी का शिकार हो रहे इंसान को हमेशा इस बात के लिए निश्चिंत किया जाता है कि उसका पैसा न सिर्फ सुरक्षित है बल्कि कुछ ही वक्त में उसे किसी बड़े बिजनस में लगाया जाने वाला है।

 

10 खास बातें

 

  • डिजिटल मार्केटिंग के नाम पर गोरखधंधा
  • दिल्ली- एनसीआर में फर्जीवाड़े की भरमार
  • चिटफंड जैसा मिलता जुलता धंधा
  • उपभोक्ता लालच के चक्कर में होता है शिकार
  • शुरू में कुछ पैसे भी मिलते हैं उपभोक्ता को 
  • लाइक से लेकर ट्वीट कराने तक का है खेल
  • पैसे से लिखाया जाता है पॉजीटिव रिव्यू 
  • पकड़े जाने के बाद भी बंद नहीं होता धंधा
  • ठोस कानून का न होना सबसे बड़ी कमी
  • सरकार को बनानी होगी ठोस नीति