देश में 22 सितंबर से जीएसटी सुधारों के दूसरे दौर की शुरुवात हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए इसे उपभोक्ता हितों के लिहाज से एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने जनता से इन सुधारों का फायदा उठाने का आग्रह करते हुए खरीदारी करने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री ने इसे बचत उत्सव का नाम दिया।
दावा किया गया किया गया कि जीएसटी दरों में कमी का फायदा आम लोगों को मिलेगा और लोग खरीदारी के लिए प्रेरित होंगे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाया?
इस गुलाबी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। इस दौरान राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर 25 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज कराई गई। अधिकतर शिकायतें ऑनलाइन खरीदारी से संबंधित थीं। शिकायतों के दो बातें सबसे ज्यादा पाई गईं। पहली, घटे हुए जीएसटी का फायदा नहीं मिलना यानी सामान उसी पुरानी महंगी कीमत पर मिलना और दूसरा घटिय़ा सामान की जिम्मेदारी से लेने से ऑनलाइन कंपनियों का हाथ झाड़ लेना।
यहां चर्चा ऑनलाइन कंपनियों की जिम्मेदारी के बारे में होगी।
ऑनलाइन कंपनियां अधिकतर उपभोक्ताओं की अनभिज्ञता का फायदा उठाती हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला 2024 का है, जो अमेज़न सेलर सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड बनाम उपभोक्ता के मामले में न्यायमूर्ति बी.आर. गवई एवं न्यायमूर्ति पी.एस.नरसिम्हा की पीठ ने सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार की धाराओं के अधीन अमेजन जैसी कंपनियां जिम्मेदार ठहराई जा सकती हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘Fulfilled by Amazon’ टैग से उपभोक्ता को यह विश्वास होता है कि उत्पाद अमेजन की जिम्मेदारी में हैृ- यह ‘representation’ का हिस्सा है। अमेजन का व्यवसाय मॉडल विक्रेता और खरीदार के बीच विश्वास के मध्यस्थ का नहीं, बल्कि व्यावसायिक संयोजक (business facilitator) का है। इसलिए उपभोक्ता को नुकसान होने पर अमेजन संयुक्त रूप से उत्तरदायी है।
इस मामले की पृष्ठभूमि की बात की जाए तो एक उपभोक्ता ने अमेजन इंडिया प्लेटफॉर्म से एक मोबाइल फोन खरीदा। कुछ ही दिनों में मोबाइल में गंभीर खराबी पाई गई। उपभोक्ता ने रिटर्न/रिफंड के लिए आवेदन किया परन्तु अमेजन ने यह कहकर उसे अस्वीकार कर दिया कि: वह तो केवल एक मध्यस्थ है, असली विक्रेता तीसरा पक्ष है। उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज की। आयोग ने अमेजन को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया। यह निर्णय राज्य आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने भी बरकरार रखा। अंत में अमेजन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
अमेजन की दलील थी कि, वह केवल एक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म/मध्यस्थ है। विक्रेता और खरीदार के बीच लेनदेन अमेजन के नियंत्रण में नहीं होता। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(47) के तहत अमेजन को ‘सेवा प्रदाता’ नहीं माना जा सकता। विक्रेता का नाम और विवरण वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से दिया गया था, इसलिए जिम्मेदारी विक्रेता की है।
उपभोक्ता का कहना था कि, अमेजन ने उत्पाद की पैकेजिंग, डिलीवरी और पेमेंट — तीनों का नियंत्रण अपने पास रखा। अमेजन पर उत्पाद की ‘Fulfilled by Amazon’ टैग था, जिससे उपभोक्ता को यह लगा कि अमेजन ही विक्रेता है। ग्राहक सेवा अमेजन की थी, विक्रेता से सीधा संपर्क नहीं कराया गया। इस दृष्टि से अमेजन केवल एक प्लेटफ़ॉर्म नहीं, बल्कि व्यवसायिक भागीदार के रूप में कार्य कर रहा था।
इन सारे तथ्यों के ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, यदि कोई ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म विक्रय, भुगतान, पैकेजिंग या डिलीवरी प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेता है, तो वह केवल ‘मध्यस्थ’ नहीं बल्कि ‘सेवा प्रदाता’ माना जाएगा।
शीर्ष अदालत ने इस मामले में एक उल्लेखनीय टिप्पणी की। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि, ऑनलाइन कारोबार उपभोक्ताओं के भरोसे पर चलता है। यदि यह भरोसा टूटता है, तो पूरा डिजिटल अर्थतंत्र प्रभावित होता है।
सुप्रीम कोर्ट का य़ह फैसला पूरे ऑनलाइन कारोबार के लिए एक दिशा निर्देश है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म यह कह कर मामले से हाथ नहीं झाड़ सकता कि वह तो केवल विचौलिए की भूमिका में है यानी विक्रेता और क्रेता के बीच की कड़ी। हमारे देश में अधिकतर उपभोक्ताओं को बाजार के इस कपट की समझ या जानकारी नहीं होती और इसका बेजा फायदा उठाया जाता है|
