मेरे जीवन में दो प्रवृत्तियां : अध्ययन और राजनीति- दोनों में संघर्ष…

मेरे जीवन में दो प्रवृत्तियां : अध्ययन और राजनीति- दोनों में संघर्ष…

हमारे देश में राजनेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है। कुछ को लोग जान पाते हैं, वे चर्चा में रहते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी रहे हैं जिन्हें लोगों ने कम जाना, कम समझा। उन लोगों का योगदान भी दूसरे शीर्ष नेताओं से कम नहीं था बस, उनकी चर्चा कम हुई। ऐसे कर्मयोगियों में आचार्य नरेंद्र देव भी थे। सहज, सरल, विद्वता के शिखर और राजनीति के शिखर पुरुष। 31 अक्टूबर को आचार्य जी की जयंती थी। उनके बारे में एक संस्मरण ‘समाजवाद के प्रहरी’ किताब में प्रकाशित हुआ है जिसके लेखक कैलाश चंद्र मिश्र हैं। यह आलेख उसी विस्तृत संस्मरण का अंश है।   

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आचार्य नरेंद्र देव बुद्धजीवियों की उस पीढ़ी से थे जो ‘आचार्य जी’ के नाम से जाने जाते थे। अगर आचारवान होना आचार्यत्व की पहली शर्त है तो वे आचार्यत्व की परिभाषा थे। आचार्य नरेंद्र देव का पैतृक घर तो फैजाबाद में था किंतु उनके पिता श्री बलदेव प्रसाद जी सीतापुर में वकालत करते थे। वहीं संवत 1948 में कार्तिक शुक्ल अष्टमी अर्थात 31 अक्टूबर 1889 में उनका जन्म हुआ। 

शिक्षा से राजनीति का रास्ता 

फैजाबाद, वाराणसी और इलाहाबाद में शिक्षा ग्रहण करते हुए फैजाबाद में वकालत के समय ‘होमरूल लीग’ शाखा का गठन करना निश्चित रूप से उनकी जीवन यात्रा में समाज के विकास की धारा का प्रतिपादक है। काशी विद्यापीठ की स्थापना के समय ख्यातिप्राप्त राष्ट्रभक्त श्री शिवप्रसाद गुप्त ने नरेंद्र देव जी को विद्यापीठ के संचालन के लिए बुलाया। 1921 में वे काशी विद्यापीठ वाराणसी में कुलपति के पद पर आसीन हुए।

आचार्य जी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि- “मेरे जीवन में सदा दो प्रवृत्तियां रही हैं। एक पढ़ने-लिखने की दूसरी राजनीति की। दोनों में संघर्ष रहता है। यदि दोनों की सुविधा एक साथ मिल जाए तो मुझे परितोष होता। यह सुविधा मुझे काशी विद्यापीठ में मिली।” विद्यापीठ उस समय विद्वानों का संगम स्थल था। उस समय वहां डॉ. भगवान दास, डॉ. संपूर्णानंद, श्री वेद प्रकाश वेद शिरोणमि, पं.रुद्र देव और पं.गांगेय नरोत्तम शास्त्री आदि उच्च कोटि के विद्वान कार्यरत थे। इन विद्वानों के साथ आचार्य जी ने 1921 से काशी विद्यापीठ में अध्यापन का कार्य आरंभ किया। 

वे किसानों के बड़े हितचिंतक थे। अवध के चार प्रमुख जिलों रायबरेली, प्रतापगढ़, फैजाबाद और सुल्तानपुर में किसान आंदोलन व्यापक रूप से फैल चुका था। बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में उन्होंने आंदोलन में भाग लिया.। किसानों की मुख्य मांगे थीं कि बेदखली रोकी जाए, बेगार पर रोक लगाई जाए। उनकी किसानों की सभाओं में लाखों की भीड़ होती थी। हिंदू और मुसलमान, स्त्री और पुरुष सभी इसमें सम्मिलित होते थे। 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में गोली चली जिसके कारण आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। आचार्य नरेंद्र देव ने किसानों की मांगों का समर्थन करते हुए कई प्रभावशाली भाषण दिए। इन भाषणों की चर्चा सारे अवध में फैल गई और आचार्य जी एक ओजस्वी वक्ता समझे जाने लगे। तपती धूप में हजारों की संख्या में किसान उनकी घंटों प्रतीक्षा करते। वहीं से इनके सक्रिय राजनैतिक जीवन का श्रीगणेश हुआ। सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण वह 1930 में पहली बार जेल गए और सन 1942 तक उनकी जेल यात्राओं का सिलसिला चलता रहा1 7 मई 1934 को कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने समाजवादी दल की स्थापना में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 

आचार्य जी सच्चे अर्थों में शिक्षक थे। कुलपति के पद को सुशोभित करते हुए भी लखनऊ विश्वविद्यालय में आचार्य जी हम लोगों को प्राचीन भारतीय इतिहास पढ़ाया करते थे। पाली भाषा की कक्षाओं के अध्यापन में विशेष रुचि लेते थे। स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तो इस तरह पढ़ाते थे कि लगता था जैसे सारी घटनाएं आंखों के सामने घटी हों। आचार्य जी का विचार था कि हम कल्याणकारी राज्य स्थापित करने का दावा करते हैं इसलिए इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए सरकार को काफी संख्या में अध्यापकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, यंत्रचालकों और महाप्रबंधकों की तथा छोटे-छोटे अन्य कार्यों के लिए सुशिक्षित व्यक्तियों की सेवाओं की आवश्यकता पड़ेगी। इसका यह अर्थ होता है कि विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक तथा यांत्रिक शिक्षा की सुविधाओं को विकसित किया जाए। अपने इन विचारों को मूर्त रूप देने के उद्देश्य से अस्वस्थ्य होते हुए भी अपने मित्रों और शिक्षाविदों के आग्रह पर आचार्य जी ने 1947 में लखनऊ विश्वविद्यालय के और 1951 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रबंध का भार कुलपति के रूप में ग्रहण किया। वे लगभग साढ़े चार वर्ष तक लखनऊ विश्वविद्यालय के और लगभग ढाई वर्ष तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। आचार्य जी ने जब इन विश्वविद्यालयों के प्रबंधन का उत्तरादायित्व ग्रहण किया था, उस समय इनकी दशा काफी चिंताजनक थी। उनके कार्यकाल में इन विश्वविद्यालयों की दशा में आश्चर्यजनक सुधार हुआ। इसका मूल कारण उनका व्यक्तित्व, विद्यार्थियों के प्रति उनकी व्यापक सद्भावना और सहानुभूति, उनकी योग्यता, उनका त्याग और न्यायप्रिय-निष्पक्ष व्यवहार था। आचार्य जी ने दोनों विश्वविद्यालयों में अपने वेतन का चालीस प्रतिशत विद्यार्थियों की सहायता में लगाने का निश्चय किया और दान के आधार पर  ‘छात्र कल्याण निधि’ की स्थापना की। आचार्य जी की सहानुभूति और सद्भावना हर परिस्थिति में विद्यार्थियों के साथ थी। उनका हितचिंतन, उनका मार्गदर्शन आचार्य जी के नेतृत्व का विशिष्ट अंग था। वे विद्यार्थियों के कष्टों और हितों की उपेक्षा को एक महान अपराध समझते थे। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों की आवासीय समस्या को हल करने के लिए ‘कुलपति निवास’ को छात्रावास में परिवर्तित करना एक अनुपम उदाहरण अन्य कुलपतियों के लिए भी था। 

आचार्य नरेंद्र देव, गांधी और लुई फिशर

जो भी वे लिख गए हैं दिशा-निर्देशक हैं। उनके ‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’ को पढ़कर हजारों नौजवान समाजवाद में दीक्षित हुए। वे भारतीय संदर्भ में समाजवाद को विशेषत: मार्क्स की तरह से समझने का दावा कर सकते थे। लुई फिशर महात्मा गांधी से जब वर्धा में मिले और उनसे भारतीय समाजवाद के बारे में जानना चाहा। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘अगर भारतीय समाजवाद के बारे में जानना है तो पास की झोपड़ी में जाएं। वहां पर एक दुबला-पतला व्यक्ति मिलेगा जिसका नाम नरेंद्र देव है। उसके मुख से निकली हुई बातें ही भारतीय समाजवाद है।’

कांग्रेस की छत्रछाया में 1934 में समाजवादी विचारों की नींव रखने वालों में आचार्य नरेंद्र देव प्रमुख थे। तब से मृत्युपर्यंत वे बड़ी बेचैनी से अपने विश्वासों के प्रति संघर्ष करते रहे। मार्क्स पर आंतरिक आस्था रखते हुए भी वह गांधी जी के प्रति बराबर विश्वास से भरे रहे। 1951 में आचार्य जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘इलेक्शन मेनिफेस्टो’ पर बिना भेदभाव के पं.जवाहरलाल नेहरू (कांग्रेस), श्यामा प्रसाद मुखर्जी(जनसंघ), डॉ. भीमराव अंबेडकर(रिपब्लिक सोशलिस्ट पार्टी), श्री जयप्रकाश नारायण (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी) और डॉ. जेड. ए. अहमद (कम्युनिस्ट पार्टी) को अपने विचार विद्यार्थियों के समक्ष रखने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने शिष्टाचार की आदर्श मिसाल उपस्थित की। 

छात्रों में बेहद लोकप्रिय

आचार्य नरेंद्र देव लखनऊ विश्वविद्यालय में कितने लोकप्रिय थे इसका अंदाजा तो 1951 में देखने को मिला जब आचार्य जी लखनऊ छोड़कर काशी जा रहे थे। सैकड़ों छात्रों ने उन्हें रोकने के लिए कुलपति कार्यालय के सामने धरना दिया। वाराणसी में आचार्य जी की काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर नियुक्ति की सूचना मिलते ही छात्रावासों में दिवाली मनाई गई। आचार्य जी का स्वागत महिला विद्यालय की छात्राओं ने आरती उतार कर और पुष्पवर्षा करके किया। वहां के प्रमुख समाचार पत्र ‘आज’ ने लिखा ‘ऐसा स्वागत देवताओं को भी दुर्लभ।’

अलौकिक मानवीय स्वरूप  

आचार्य जी परम मानवीय थे। वे सरल और सह्रदय थे। सभ्य और विनम्र थे। कभी-कभी उनकी सरलता और विनम्रता सारी औपचारिकताओं को भी तोड़ देती थी। ऐसी ही एक घटना 1954 में मेरे साथ घटी। आचार्य जी अपने इलाज के लिए फ्रांस गए थे। फ्रांस की राजधानी पेरिस में उनका उपचार चल रहा था। मैंने यह समाचार रूस की राजधानी मास्को में ‘प्रावदा’ समाचार पत्र द्वारा जाना। सूचना मिलते ही मैंने मास्को के राजदूत श्री के.पी.एस.मेनन से फ्रेंच दूतावास से आचार्य जी के स्वास्थ्य की ताजा स्थिति और पेरिस हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी को भेजकर आचार्य जी का पता देने का निवेदन किया। पेरिस हवाई अड्डे पर आचार्य जी को खड़ा देख कर मेरे मन में अपराध बोध का भाव जाग उठा। आचार्य जी ने मेरी भावनाओं को समझकर बड़े प्यार से कहा- “फ्रांस में फ्रेंच का ज्ञान ना होने के कारण तुम्हे मेरे पास पहुंचने में कठिनाई होती, इसीलिए मैं स्वयं चला आया।” वे स्वभाव से जितने सरल थे, व्यवहार से उतने शालीन और उदार। अनुशासन के बारे में उतने अडिग भी थे। प्रिय से प्रिय व्यक्ति की अनुशासनहीनता को वे बर्दाश्त नहीं करते थे। 

बुद्ध से मोह

बौद्ध धर्म से उनका मोह था और मार्क्सवाद से उनकी प्रतिबद्धता। मृत्यु शय्या पर पड़े-पड़े उन्होंने मृत्यु से मात्र दो दिन पहले ‘बौद्ध धर्म दर्शन’ पर अपना अप्रतिम ग्रंथ पूरा किया। डॉ.टी.आर.वी.मूर्ति का कहना था कि “ बौद्ध धर्म पर ऐसी समग्र पुस्तक दुनिया की किसी भी भाषा में आज तक लिखी ही नहीं गई। बौद्ध धर्म की जितनी शाखाओं, उप-शाखाओं की उसमें आधिकारिक विवेचना है, बहुतों ने उनका नाम भी नहीं सुना होगा। ” एक बार बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान प्रो.लक्ष्मी नारायण तिवारी ने मुझसे कहा था, “इस ग्रथ में बहुत सारे ऐसे पृष्ठ हैं जिनका विस्तार करके डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त प्राप्त की जा सकती है।”

सरलता एवं हास्य के पुंज

सरल, हास्य और विनोद के आचार्य जी जीवित पुंज थे। सन 1952 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र यूनियन के उद्घाटन के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू आने वाले थे। उनकी अगवानी के लिए छात्र यूनियन और छात्र संसद के पदाधिकारी बाबतपुर हवाई अड्डे पर गए हुए थे। भारत के प्रधानमंत्री से मेरा परिचय कराते हुए आचार्य जी ने कहा- “ये बी.एच.यू. कंट्री के प्रधानमंत्री हैं जिनके देश में कोई निरक्षर नहीं है और इनकी संसद में अधिकतर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं।” पं. नेहरू यह सुनकर हंस पड़े और इसके बाद जो ठहाका वहां लगा तो सारा एयरोड्रोम हिल उठा। 

सन 1937 में उनके विषय में सोचा जाता था कि वह उत्तरप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बनेंगे परंतु वह गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1935 के अंतर्गत मंत्री पद के उत्तरादायित्वों को स्वीकार करने के भी विरुद्ध थे। इसीलिए यह प्रस्ताव भी उन्हें लुभा ना सका। 

सादा जीवन उच्च विचार तथा लगन के साथ काम करने में अनुशासन यह तीनों ही प्रवृत्तियां उनमें एकाकार होकर आ जमी थीं। गांधी युग में भी आचार्य नरेंद्र देव के नैतिक व्यक्तित्व का राजनीतिक क्षेत्र में एक असीम प्रभाव था। उत्तरप्रदेश विधानसभा में वह कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में चुने गए थे। इसीलिए जब वह कांग्रेस से अलग हुए तो विधानसभा की सदस्यता से त्याग-पत्र दे देना उन्होंने अपना नैतिक कर्तव्य समझा। आचार्य नरेंद्र देव, 19 फरवरी 1956 को शरीर के जीर्ण वस्त्र को त्यागकर उस लोक में चले गए जहां सबको जाना है।