जानिए, सोच बदली तो, कैसे बदल गई किस्मत
किल्लतों से जूझता गांव बन गया एक आदर्श गांव
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किसान पंचायत में आज कहानी राजस्थान के झुंझुनू जिले के गाम सूरजगढ़़ की। यह कहानी मरुस्थल के बीच बसे गांवों में जिंदगी की जद्दोजहद और फिर उस पर पार पाने की है।
सूरजगढ़़ एक समय में पानी की किल्लत, अशिक्षा और बेरोजगारी की समस्या के लिए जाना जाता था। गर्मी के दिनों में गांव के लोग मीलों दूर से पानी लाते थे। बच्चे अक्सर स्कूल छोड़ देते थे और महिलाएं घर की चारदीवारी तक ही सीमित थीं।
लेकिन इसी बीच, गांव में बदलाव की शुरूवात हुई। बदलाव के लिए जरूरी है सबसे पहले सोच में बदलाव। गांव के नए सरपंच चुने गए गोविंद सिंह। उन्होंने सबसे पहले ग्राम सभा बुलाई। चौपाल पर पेड़ के नीचे गांव के सब लोग जुटे।
गोविंद सिंह ने सरपंच बनते ही गांव के लोगों को अपनी समस्या से निपटने के लिए उन्हें प्रेरित करने की ठानी। उन्होंने अपने पहले ही संबोधन में गांव की समस्याओं से दो-दो हाथ करने का संकल्प लिय़ा। उन्होंने कहा कि, ‘भाइयों और बहनों, अब वक्त आ गया है कि हम मिलकर सूरजगढ़ को बदलें। हमें पानी, शिक्षा और रोज़गार पर सबसे पहले काम करना होगा। क्या आप सब तैयार हैं?’
गोविंद सिंह की बातों पर पहले की तरह ही गांव वालों ने ध्यान नहीं दिया। गांव के बुजुर्ग राधेश्याम ने उनको जवाब देते हुए कहा कि, ‘बेटा, बातें तो पहले भी हुई हैं, लेकिन काम अधूरा रह जाता है।‘
गोविंद सिंह को बुजुर्ग राधेश्याम की बात अखर गई। उन्होंने कहाकि, ‘इस बार अधूरा नहीं रहेगा। हर फैसले में सबकी भागीदारी होगी। पंचायत अकेले नहीं, पूरा गांव मिलकर काम करेगा।‘
दिलचस्प बात यह रही कि, गांव सभा में पहली बार महिलाओं ने भी खुल कर अपनी बातें और समस्याएं रखीं। महिला प्रतिनिधि समूह से गायत्री देवी ने कहा कि, ‘अगर पंचायत हमें सहयोग दे तो हम महिलाएं भी काम करने को तैयार हैं। हमें सिर्फ अवसर चाहिए।‘
गांव के लोगों ने सभा में मिलकर पांच संकल्प लिए :
- पानी की समस्या का स्थायी समाधान किया जाए।
- गांव का हर बच्चा स्कूल जाएगा।
- गांव में सफाई और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाएगा।
- गांव के हर निर्णय में लोकतांत्रिक भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
संकल्प पर कार्यान्वयन
- पंचायत ने मनरेगा योजना से गांव में तालाब और चेक डैम बनवाए। बरसात का पानी अब गांव में ही रुकने लगा। नतीजा, गांव में पेयजल की समस्या के साथ सिंचाई के लिए भी पानी उपलब्ध होने लगा।
- स्कूल के टीचर अनिल जी ने बच्चों को समझाया कि, ‘बच्चों, पढ़ाई ही तुम्हारे गांव की ताकत बनाएगी। अब कोई बच्चा स्कूल से बाहर नहीं रहेगा।‘ गांव के सभी बच्चे पढ़ने-लिखने लगे तो उनमें शिक्षा के साथ जिम्मेदारी का भाव भी जागृत होने लगा।
- महिलाओं ने स्वयं-सहायता समूह बनाए। गायत्री देवी और उनकी सहेलियों ने बकरी पालन और कढ़ाई-बुनाई का काम शुरू किया। इसके अलावा गांव की महिलाओं ने और भी कई तरह के काम मिलकर शुरू किए। महिलाओं की कमाई शुरू हुई तो उनमें आत्मनिर्भरता का भाव जागा। घरों में और पैसे आने लगे। समृद्धि आई तो तमाम जरूरतें पूरी होने लगीं।
- पंचायत ने हर घर में शौचालय बनवाए। सरपंच गोविंद सिंह ने कहा कि, ‘अब सूरजगढ़ खुले में शौच से मुक्त बनेगा। यह हमारी इज़्ज़त और सेहत दोनों की रक्षा करेगा।‘ हर घर में शौचालय से गांव में स्वच्छता जैसी बुनियादी जरूरत के पूरा होने का भाव भी पैदा हुआ।
- युवाओं ने मिलकर गांव में एक डिजिटल लर्निंग सेंटर खोला। कंप्यूटर पर काम सीखने लगे। युवाओं के पास अब ज्यादा रोजगार के मौके आने लगे। कंप्य़ूटर के ज्ञान और प्रशिक्षण से उन्हें बाहरी दुनिया के साथ संपर्क में आने का बेहतर मौका मिला और अब उनके पास पहले से बेहतर अवसर उपलब्ध थे।
बदलने लगी गांव की तस्वीर
समय लगा लेकिन सूरजगढ़ पूरी तरह बदल गया।
- खेतों में हरियाली लौट आई। किसान अब दो फसलें लेने लगे। उन्हे अपने खेतों से पहले से ज्यादा उपज और पैसे मिलने लगे।
- बच्चों की पढ़ाई के परिणाम आने लगे। सरपंच की बेटी पूजा ने दसवीं कक्षा में ज़िले में टॉप किया। बच्चों ने पढ़ाई की तो जिले में नाम होने लगा। गांव में आगे की शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचा जाने लगा।
- महिलाएं आत्मनिर्भर होने लगीं और घर की आय बढ़ाने लगीं। पति को घर की महिला का साथ मिला तो वे भी अपने काम और उपज को और आगे बढ़ाने के लिए कुछ सोचने और करने लगे।
- गांव इतना स्वच्छ हुआ कि बाहर से आने वाले लोग तारीफ़ करने लगे। गांव आदर्श बना तो दूसरे गांवों के लिए प्रेरणा बना। दूसरे गांव भी साफ-सफाई, शिक्षा और अपनी समस्याओं से निपटने के लिए खुद को सक्षम बनाने की य़ोजना पर काम करने लगे।
और सूरजगढ़ बन गया दूसरों के लिए प्रेरणा की वजह
आज फिर गांव में सभा बुलाई गई थी। पहली बैठक में नाउम्मीदी की बात करने वाले बुजुर्ग राधेश्याम आज भी मौजूद थे लेकिन उनके सुर बदले हुए थे। उन्होंने सभा में खड़े होकर कहा, ‘आज मुझे गर्व है कि हमने मिलकर सूरजगढ़ को आदर्श पंचायत बना दिया। यह सब हमारी एकता और मेहनत का नतीजा है।‘
गांव के बच्चे तालियां बजाने लगे और महिलाएं ख़ुशी से झूम उठीं। सूरजगढ़ अब सिर्फ एक गांव नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन गया।
सूरजगढ़ की यह कहानी बताती है कि यदि ग्राम पंचायत और ग्रामीण मिलकर ईमानदारी और मेहनत से काम करें, तो किसी भी गांव को आदर्श पंचायत में बदला जा सकता है। सूरजगढ़ अब न केवल झुंझुनूं ज़िले बल्कि पूरे राजस्थान और देश के लिए एक प्रेरणा बन चुका है।
