कीटनाशक का इस्तेमाल करें, लेकिन जरा संभल कर……..!

कीटनाशक का इस्तेमाल करें, लेकिन जरा संभल कर……..!

मानव के साथ पर्यावरण के लिए भी खतरनाक 

मिट्टी के साथ भूजल का भी काम-तमाम

……………

 

पंकज कुमार सिंह

 

अधिक उपज की चाह में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग  से जमीन की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ रहा है। इन रसायनों से जहाँ एक ओर कीटों का नियंत्रण होता है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी की सेहत पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कीटनाशक मिट्टी के लाभकारी जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे उसकी उर्वरता घटती है। लगातार उपयोग से मिट्टी की संरचना बिगड़ जाती है और रासायनिक अवशेष भूजल में पहुंचकर जल प्रदूषण भी बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप फसलों की गुणवत्ता और पैदावार दोनों पर असर पड़ता है। इसके अतिरिक्त यह प्रत्यक्ष रूप से वायु, पशु और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है।

 

कीटनाशकों के बाजार में अवैध और नकली कीटनाशकों की भरमार है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम  (यूएनईपी, 2021 ) का अनुमान है कि वैश्विक बाजार में हर साल आने वाले 5 से 15 प्रतिशत कीटनाशक अवैध या नकली होते हैं। किसानों के स्वास्थ्य, फसल और खाद्य सुरक्षा को होने वाले नुकसान के अलावा, इन अवैध और नकली कीटनाशकों का प्रयोग मिट्टी को प्रदूषित कर करता है और भविष्य में होने वाली फसलों की व्यवहार्यता पर भी असर डाल सकता है। 

पिछले कुछ दशकों में खेत में कीटनाशक के उपयोग में बेतहाशा बृद्धि दर्ज की गई है। कीटनाशकों और उर्वरकों पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की रिपोर्ट बताती है कि फसल भूमि की प्रति इकाई कीटनाशक सक्रिय घटक के उपयोग की दर 1990 में 1.9 किलोग्राम / हेक्टेयर से बढ़कर 2016 में 3.3 किलोग्राम / हेक्टेयर हो गई है जो कि विश्व स्तर पर 34.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कि गई है। एशिया क्षेत्र में कीटनाशक उपयोग की वृद्धि दर 33.2 प्रतिशत दर्ज कि गई है।   

 

सिडनी विश्वविद्यालय और खाद्य व कृषि संगठन ने बताया कि दुनिया भर में  खेतों में करीब 30 लाख टन कीटनाशक का उपयोग किया जाता है। इसमें से करीब 70 टन कीटनाशक जमीन के अंदर भू-जल में मिल रहा है। यह जमीन के अंदर मौजूद पानी को भी जहरीला बना रहा है। शोध में सामने यह भी सामने आया है कि कृषि कार्य में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशक लम्बी दूरी तय कर नदियों और समुद्र तक पहुंच रहा है। अध्ययन में यह सामने आया है कि 710 टन कीटनाशक प्रतिवर्ष की दर से नदियों में घुल रहा है। इन कीटनाशकों में से करीब 710 टन हर साल समुद्रों तक पहुंच रहा है जो वहां भी समुद्री जीवन और  उसके पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन रहा है।

 

 अधिकांश मात्रा में कीटनाशक अणुओं में विभाजित हो कर फसलों के आस- पास ही मिट्टी में विघटित हो जाते हैं। शोधकर्ता कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि “कभी फसलों के लिए वरदान समझे जाने वाले यह कीटनाशक आज इनके बेतहाशा बढ़ते उपयोग के कारण अभिशाप बन गए हैं। कीटनाशक पर्यावरण के साथ – साथ, पानी, मिट्टी, हवा और खाद्य पदार्थों को भी जहरीला बना रहे हैं। आज यह न केवल जैविक विविधता बल्कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गए हैं। इनका अंधाधुन तरीके से खेतों में होता उपयोग, किसानों के लिए भी खतरा है क्यूंकि यह मिट्टी की गुणवत्ता को बिगड़ रहा है।“

 

भारत दुनिया भर में कीटनाशकों का उत्पादन करने वाले शीर्ष देशों में से एक है, लेकिन यहाँ प्रति हेक्टेयर कीटनाशकों की खपत विकसित देशों की तुलना में कम है। इसके बावजूद, सघन कृषि पद्धतियों के कारण, विशेष रूप से पंजाब, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, कीटनाशकों का व्यापक उपयोग हुआ है। आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशकों में ऑर्गेनोक्लोरीन, ऑर्गेनोफॉस्फेट और सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड शामिल हैं।

 

खेतों के कीटनाशक से प्रदूषण का राज्यवार विश्लेषण

अध्ययनों से भारत भर में कीटनाशक अवशेषों के विभिन्न स्तरों की जानकारी मिली है जिसमे बताया गया है कि पंजाब में 0.74 किग्रा/एकड़ प्रति कीटनाशक की अनुप्रयोग दर है जो कि पूरे देश में  सबसे अधिक है। वहीं उत्तर प्रदेश कीटनाशक की खपत में सबसे ऊपर रहा, इसके बाद महाराष्ट्र और पंजाब का स्थान रहा। इन तीन राज्यों में भारत की कुल कीटनाशक खपत का लगभग 51% है। पंजाब और हरियाणा के भूजल में ऑर्गनोफॉस्फेट अवशेषों का उच्च स्तर, प्रभावित क्षेत्रों में कैंसर और तंत्रिका संबंधी विकारों के मामलों में वृद्धि का कारण बन रहा है। गेहूँ और चावल की खेती में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के परिणामस्वरूप पेयजल स्रोत दूषित हो गए हैं, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो रहे हैं। केरल और तमिलनाडु में  एंडोसल्फान संदूषण गंभीर स्वास्थ्य संकटों से जुड़ा है, जिसमें स्थानीय आबादी में जन्मजात विकलांगता और बांझपन शामिल है। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पेयजल स्रोतों में क्लोरपाइरीफॉस और मैलाथियान पाए गए हैं, जिससे निवासियों में तीव्र और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है। महाराष्ट्र के विदर्भ में, कपास की खेती में अत्यधिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से कीटनाशक विषाक्तता बढ़ रही है। पश्चिम बंगाल और असम में चाय बागानों में कीटनाशकों के गहन प्रयोग के कारण मिट्टी और जल निकायों में डीडीटी, एचसीएच और ऑर्गेनोफॉस्फेट की उपस्थिति बढ़ रही है। कई चाय बागानों ने निर्यातित चाय उत्पादों में कीटनाशक अवशेषों की सूचना दी है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधी चिंताएँ पैदा हो रही हैं। 

गुजरात और कर्नाटक में  सब्जियों और फलों की फसलों में कीटनाशकों के अवशेषों में वृद्धि, जिससे खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएँ पैदा हो रही हैं। बाज़ार सर्वेक्षणों से पता चला है कि टमाटर, बैंगन और खीरे जैसी आम तौर पर खाई जाने वाली सब्जियों में कीटनाशकों के अवशेष अक्सर स्वीकार्य सीमा से ज़्यादा होते हैं। बिहार और ओडिशा में सतही जल निकायों में कीटनाशकों के प्रदूषण से मत्स्य पालन और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं। नदी आधारित मत्स्य पालन पर निर्भर स्थानीय समुदायों ने कीटनाशकों से उत्पन्न पारिस्थितिक असंतुलन के कारण मछलियों की संख्या में कमी और आय में गिरावट की सूचना दी है।

 

कीटनाशक प्रदूषण के पर्यावरणीय परिणाम

 

पर्यावरण का लगभग हर हिस्सा कीटनाशकों से दूषित हो चुका है। कीटनाशकों के अवशेष मिट्टी, हवा, भूजल और सतही जल में पाए जाते हैं। कीटनाशकों के अवशेष मिट्टी में लंबे समय तक बने रहते हैं जिससे मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। कीटनाशक मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और लाभकारी जीवों, जैसे केंचुओं, को नुकसान पहुंचाता है, जो पोषक तत्वों के चक्रण और जैविक पदार्थों के विघटन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार होते हैं।  कीटनाशक प्रदूषण ने पर्यावरण और गैर-लक्षित जीवों, जिनमें सूक्ष्मजीवों से लेकर कीड़े, मछलियाँ, पक्षी और पौधे शामिल हैं, के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। कीटनाशकों के विविध पारिस्थितिक प्रभाव होते हैं और ये अक्सर आपस में जुड़े होते हैं। पारिस्थितिक स्तर पर प्रभावों को आमतौर पर मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभावों के प्रारंभिक संकेत के रूप में पहचाना जाता है। ये प्रभाव किसी जीव पर इस्तेमाल किए गए कीटनाशक के प्रकार के अनुसार भिन्न होते हैं। अधिकांश पारिस्थितिक प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं और शोधकर्ताओं द्वारा रिपोर्ट नहीं किए जाते हैं, इसलिए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए समस्याएँ हैं।

 

खेत में किया गया कीटनाशक का उपयोग वर्षा या सिंचाई के जल के साथ कीटनाशक नदियों, तालाबों व भूजल में पहुंच जाते हैं।  इससे जलीय जीवों की मृत्यु होती है और पीने योग्य जल प्रदूषित हो जाता है। जलस्रोतों में कीटनाशक का जमाव बायोमैग्निफिकेशन (Bio-magnification) को बढ़ाता है यानी जल जीवों से होते हुए यह मनुष्य के शरीर तक पहुंचते हैं। वर्तमान में भारत में 70% से अधिक कीटनाशकों में एचसीएच और डीडीटी जैसे ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशक शामिल हैं। भोपाल, दिल्ली और कुछ अन्य शहरों तथा कुछ ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त रिपोर्टों से पता चला है कि मीठे पानी की प्रणालियों के साथ-साथ बोतलबंद पेयजल के नमूनों में भी कीटनाशकों की उच्च मात्रा पाई गई है। 

 

कीटनाशकों से मानव स्वास्थ पर प्रभाव

कीटनाशकों का मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। मनुष्यों के लिए इनके संपर्क का मुख्य मार्ग भोजन के माध्यम से होता है। कीटनाशकों के संपर्क में आने से अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। हालाँकि जब तक कोई व्यक्ति नियमित रूप से कीटनाशकों के संपर्क में न रहे, तीव्र विषाक्तता असामान्य है, लेकिन कीटनाशकों की कम खुराक के दीर्घकालिक संपर्क से कई दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ होने की संभावना रहती है। कीटनाशक कोशिकीय प्रक्रियाओं को भी बाधित कर सकते हैं और डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे संभावित रूप से कैंसर कोशिकाओं का विकास हो सकता है। विशेष रूप से, कीटनाशक ग्लाइफोसेट को ट्यूमर विकसित होने के बढ़ते जोखिम से जोड़ा गया है । 

 

ऐसा नहीं है कि कीटनाशकों के उपयोग से केवल उपभोक्ताओं का ही स्वास्थ्य प्रभावित होता है। किसान और कृषि श्रमिक के स्वस्थ पर भी कीटनाशक का गंभीर प्रभाव पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कीटनाशक विषाक्तता दुनिया भर में कृषि श्रमिकों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि निम्न स्तर के कीटनाशकों के लगातार संपर्क में रहने से किसानों और कृषि श्रमिकों के तंत्रिका तंत्र में कई तरह के लक्षण उत्पन्न होते हैं, जैसे सिरदर्द, थकान, चक्कर आना, तनाव, क्रोध, अवसाद, स्मृति क्षीणता, पार्किंसंस रोग , अल्जाइमर रोग आदि।

 

स्वास्थ पर कीटनाशकों के प्रभाव को कम करने के लिए उपभोक्ताओं के पास सीमित विकल्प है। खाद्य पदार्थो में कीटनाशकों के प्रभाव को कम कर पाना इस बात पर निर्भर करता है कि कीटनाशक के अवशेष सतह पर हैं, तो फलों, सब्ज़ियों और अनाज जैसी ताज़ी उपज से कुछ कीटनाशक अवशेषों को धोने से हटाने में मदद मिल सकती है। हालाँकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि अगर कीटनाशक खाद्य पदार्थों के ऊतकों में प्रवेश कर गया है, तो उसे धोने से हटाना उतना प्रभावी नहीं हो सकता। फलों और सब्जियों के छिलके को छीलना या छांटना कीटनाशक अवशेषों को कम करने का एक कारगर तरीका माना जाता है। बाहरी परतों को हटाकर, जिनमें फलों या सब्जियों के अंदर की तुलना में कीटनाशकों की अधिक सांद्रता होती है, उपभोक्ता कुछ मामलों में अपने जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया में आहार फाइबर, विटामिन और खनिज जैसे अन्य मूल्यवान घटक भी नष्ट हो सकते हैं।

 

भारत में कीटनाशक मुक्त कृषि और उत्पाद के उपाय

 

भारत में रासायनिक कीटनाशक-मुक्त खेती के समाधान के लिए प्राकृतिक खेती, शून्य बजट प्राकृतिक खेती और जैविक खेती जैसी टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना शामिल है। इसमें फसल विविधीकरण, फसल चक्र, और जैविक आदानों जैसे कि गोबर-मूत्र योगों, नीम-आधारित कीटनाशकों और जैविक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, कीटों को पकड़ने के लिए फेरोमोन और स्टिकी ट्रैप जैसे भौतिक तरीकों का उपयोग किया जाता है, जो लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल हैं। कीटनाशक-मुक्त खेती के समाधान को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाओं को लागू किया गया है। जिसमें परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी), पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट (एमओवीसीडीएनईआर) और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन प्रमुख योजनाएं हैं।  

 

उपभोक्ता सुरक्षा और बाजार

भारतमेंउपभोक्ताओंकेलिएकीटनाशक- मुक्त उत्पादों की पहचान करने के लिए उत्पादों पर प्रमाणन चिन्ह होता है जो ये गारंटी देता है कि उत्पाद सरकारी मानकों के अनुसार उगाए गए हैं।

  • जैविक भारत लोगो: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानकप्राधिकरण (FSSAI) द्वारा जारी किया गया एक एकीकृत लोगो है। यह भारत में जैविक खाद्य उत्पादों की आधिकारिक पहचान है।
  • इंडिया ऑर्गेनिक (India Organic) लोगो: यह लोगो कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) द्वारा प्रमाणित उत्पादों पर लगाया जाता है। यह प्रमाणित करता है कि उत्पाद राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (NPOP) के मानदंडों को पूरा करता है।
  • PGS-इंडिया लोगो: यह भारत में जैविक उत्पादों के लिए एक वैकल्पिक प्रमाणन प्रणाली है। इसमें ‘PGS-इंडिया ऑर्गेनिक’ और ‘PGS-इंडियाग्रीन’ लोगो शामिल हैं, जो प्रमाणित जैविक खेतों से प्राप्त उत्पादों के लिए होते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय सर्टिफिकेशन:कुछउत्पादोंपर ECOCERT जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणन भी हो सकते हैं, जो वैश्विक मानकों का पालन करते हैं।