क्योंकि, पृथ्वी नाम का यह ग्रह आज ICU में है ……..!

क्योंकि, पृथ्वी नाम का यह ग्रह आज ICU में है ……..!

प़थ्वी की सेहत से जुड़ी 9 सीमाओं का निर्धारण

सात में खतरे का निशान पार कर चुकी है पृथ्वी

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जर्मनी में प्रकृति और पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था पॉट्सडाम इंस्टिट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च (पीआईके) ने ‘प्लैनेट हेल्थ चेक 2025’ नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, अगर हमारा ग्रह एक अस्पताल का मरीज होता, तो आज वह आईसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) में भर्ती होता। संस्था से जुड़े वैज्ञानिक और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले बोरिस साक्सचेव्स्की ने कहा, ‘अभी कई पैरामीटर सामान्य दायरे से बाहर हैं। यानी वह खराब स्थिति में है और पृथ्वी नाम की यह मरीज खतरे में है।’

उन्होंने कहा कि, ‘आप इसे यूं समझ सकते हैं, जैसे किसी मरीज के शरीर में सूजन का स्तर बहुत ज्यादा हो, कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ हो, लिवर की हालत बिगड़ रही हो, फेफड़ा ठीक से काम न कर रहा हो, यानी एक साथ कई गंभीर समस्याएं। हर एक समस्या अपने आप में खतरनाक है, लेकिन जब ये सभी साथ मिल जाती हैं तो स्थिति और भी घातक हो जाती है।’

शोधकर्ताओं ने ‘प्लैनेटरी हेल्थ चेक’ का मानक साल 2009 में विकसित किया था। यह प्लैनेटरी बाउंड्री (पृथ्वी की सुरक्षित प्राकृतिक सीमाओं) की अवधारणा पर आधारित है। यह बताता है कि इंसानों को पृथ्वी पर जरूरत से ज्यादा बोझ डालने से कैसे बचना चाहिए।

शोधकर्ताओं ने ऐसी नौ सीमाएं चिह्नित की हैं, जिन्हें पार करना पृथ्वी के जीवन-समर्थन प्रणालियों को खतरे में डाल सकता है। इसके साथ ही मानव जीवन की नींव को भी बिगाड़ सकता है। साल 2009 तक इनमें से तीन सीमाएं पार हो चुकी थीं। फिर 2015 तक यह संख्या बढ़कर चार हो गई। साल 2023 में यह छह तक पहुंच गई और अब पीआईके के अनुसार नौ में से सात सीमाएं पार हो चुकी हैं।

इस बारे में जर्मन ऑन लाइन पोर्टल ने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट में पृथ्वी की सेहत के मानकों को ध्यान में रखते हुए श्रेणीबद्ध तरीके से इसका आंकलन किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार,  बायोस्फीयर में पृथ्वी की पूरी सतह शामिल है, जहां जमीन और पानी दोनों पर जीव-जंतु और पौधे रहते हैं। वैज्ञानिक इसकी सेहत को दो संकेतकों से मापते हैं। पहला, इसकी उत्पादकता कितनी है और दूसरा, इंसानी दोहन के बाद कितना प्राकृतिक हिस्सा बचा है। इस श्रेणी में हालात को रेड कोड में रखा गया है यानी स्थिति बेदह खराब है। 

जैव विविधता पर संकट

इंसानों ने पशुपालन, रासायनिक खाद, और उद्योग व परिवहन में नाइट्रोजन के इस्तेमाल को दोगुना कर दिया है। नाइट्रोजन सभी जीवों के लिए जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से कई नकारात्मक असर हुए हैं। अक्सर पौधे इतनी नाइट्रोजन सोख नहीं पाते। यह भूजल में रिसकर नदियों और झीलों में बहने लगता है और समुद्री तटों को प्रदूषित कर देता है और उसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसी तरह फास्फोरस भी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जरूरत से ज्यादा पोषक तत्व जैव विविधता को कम कर देते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर बना देते हैं। यह सीमा खतरे के स्तर के पार निकल चुकी है। यह सीमा भी खथरे के स्तर को पार करते हुए रेड कोड में जा चुकी है। 

नए रासायनिक पदार्थों की मार

इंसान आज 3,50,000 लाखों नए बनाने के साथ उनका प्रसार भी कर रहा है। इससे प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है खासतौर पर जैविक जीवन इससे प्रभावित होता है। चाहे नीली व्हेल हो या बैक्टीरिय इनका निर्माण मुख्य रूप से सिर्फ छह तत्वों से ही बना होता है: हाइड्रोजन, कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, फास्फोरस और सल्फर।

साक्सचेव्स्की का कहना है कि सिर्फ एक अतिरिक्त रसायन भी वैश्विक स्तर पर गंभीर हालात पैदा कर सकता है। वे बताते हैं कि, ‘अभी हम ऐसे हाल में हैं जहां हर साल हजारों नए रसायन बिना जांच-परख के पर्यावरण में छोड़े जा रहे हैं’।

पृथ्वी का तापमान

हमारी जलवायु भी अब खतरे में है। ग्रीनहाउस गैसों का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है। सबसे चिंता की बात यह है कि ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ रहा है। इसे रेडिएटिव फोर्सिंग से मापा जाता है, यानी यह देखना कि पृथ्वी के वातावरण में कितना अतिरिक्त ताप प्रवेश कर रहा है। इस मानक पर तो हम उच्च-जोखिम स्तर पर पहुंच चुके हैं।

ताजे पानी के संसाधनों पर संकट

जल स्रोतों और मिट्टी की नमी पर भी इंसानों का असर तेजी से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण सिंचाई एवं उद्योग में पानी का इस्तेमाल है। इससे पानी की उपलब्धता अस्थिर हो रही है। लंबे-नियमित सूखे और औचक बाढ़ का खतरा भी बढ़ रहा है। अब कुल जमीन के पांचवें हिस्से से भी अधिक पर सूखा, जल बहाव और मिट्टी की नमी में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं।

इस्तेमाल से बेहाल जमीन 

पृथ्वी पर बढ़ते बोझ का असर जमीन पर और भी अधिक है। इंसान प्राकृतिक प्रणालियों में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप कर रहा है। मसलन खेती के लिए जमीन तैयार करना, चारागाह बढ़ाना और लकड़ियां काटना। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन ताजे पानी की उपलब्धता को बदल रहा है। हालांकि, वनों को काटे जाने की रफ्तार धीमी जरूर हुई है लेकिन दुनियाभर में कुल वन क्षेत्र अभी भी तेजी से घट रहा है। वर्तमान में, वैश्विक वन आवरण 60 फीसदी से कम है। यह सुरक्षित न्यूनतम स्तर 75 फीसदी से काफी कम है। अगर मौजूदा वन क्षेत्र 54 फीसदी से नीचे चला जाता है, तो यहां भी उच्च-जोखिम वाली स्थिति हो जाएगी। 

महासागरों की हालत

दुनियाभर के महासागर इंसानों द्वारा छोड़े गए कार्बन डाइऑक्साइड के एक चौथाई से भी अधिक हिस्से को सोख लेते है। इसके कारण कार्बन सीधे जलवायु को गर्म नहीं करता, लेकिन यह कार्बोनिक एसिड में बदल जाता है। इससे प्राकृतिक पीएच स्तर घटता है और महासागर अम्लीकरण का शिकार होते हैं। पानी जितना अधिक अम्लीय होगा, कोरल और शंखधारी जीव अपनी कैल्सियम शेल को बनाने में उतनी ही ज्यादा दिक्कतों का सामना करेंगे। साक्सचेव्स्की के अनुसार, महासागर यह दर्शाते हैं कि विभिन्न प्लैनेटरी बाउंड्री आपस में कितनी जुड़ी हुई हैं। महासागरों का तापमान बढ़ना, जो कि जलवायु परिवर्तन से प्रेरित है और नाइट्रोजन व फास्फोरस प्रवाह के मेल से डेड जोन बनता हैं। यानी, ऐसी जगह जहां ऑक्सीजन ही नहीं है। यह भोजन शृंखला और बायोस्फीयर को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही कई नए रसायन जैसे कि प्लास्टिक भी अनंतकाल के लिए महासागरों में घुल जाते हैं।

दो मोर्चों पर अच्छी खबर

ऐसा नहीं है कि सब कुछ नकारात्मक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दो प्लैनेटरी बाउंड्री अभी भी सुरक्षित स्तर पर हैं। वायु प्रदूषण लगातार घट रहा है और हमें हानिकारक अंतरिक्ष विकिरण से बचाने वाली ओजोन परत भी लगातार दुरुस्त हो रही है। ओजोन परत की रिकवरी दर्शाती है कि समय रहते सही कदम उठाकर नकारात्मक रुझानों को पलटा जा सकता है।

जब पता चला था कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही है, तो समय रहते मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉलके तहत दुनियाभर में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

देखना यह है कि पृथ्वी की सेहत के विभिन्न मानकों को रेड जोन से बाहर लाने के लिए किस तरह के प्रयास किए जाते हैं और उसमें कितनी सफलता मिलती है।  

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इंट्रो- 1

शोधकर्ताओं ने ‘प्लैनेटरी हेल्थ चेक’ का मानक साल 2009 में विकसित किया था। यह प्लैनेटरी बाउंड्री (पृथ्वी की सुरक्षित प्राकृतिक सीमाओं) की अवधारणा पर आधारित है। यह बताता है कि इंसानों को पृथ्वी पर जरूरत से ज्यादा बोझ डालने से कैसे बचना चाहिए। शोधकर्ताओं ने ऐसी नौ सीमाएं चिह्नित की हैं, जिन्हें पार करना पृथ्वी के जीवन-समर्थन प्रणालियों को खतरे में डाल सकता है। इसके साथ ही मानव जीवन की नींव को भी बिगाड़ सकता है।